युद्घ का मैदान छोड़कर भागने पर भगवान श्रीकृष्ण कहलाए भगवान रणछोड़


ग्राम ऐंनों में 500 से अधिक साल पुराना है मध्यप्रदेश का इकलौता भगवान रणछोड़ जी मंदिर
संजय श्रीवास्तव, ग्वालियर
मध्यप्रदेश में भिंड जिले के गोहद तहसील के ग्राम ऐंनों में एक मात्र भगवान श्रीकृष्ण रणछोड़ जी का अति प्राचीन मंदिर है। यहां के मंदिर की कई चमत्कारिक कथाएं प्रचलित है। गोहद चौराहा से 14 किलोमीटर दूर आसन नदी के तट पर बने मंदिर के जीणोद्धार के लिए ग्राम पंचायत एेनों के सरपंच दिनेश सिंह तोमर सहित गांव के लोगों ने तन-मन-धन से लगे हुए हैं। कभी बागी एवं डाकुओं के लिए जाने जाना वाला ऐंनों गांव में धार्मिक आस्था की बयार है। भिंड-मुरैना जिले की सीमा पर आसन नदी के किनारे बसे इतिहासिक गांव के चारों दिशाओं में भगवान शिव (नदी के किनारे) व नर पर भगवान भोले बाबा मंदिर, भगवान रणछोड़जी (एंडोरी की तरफ) एवं पवनपुत्र हनुमान डांडे वाले (भिंडोसा की तरफ) विराजमान हैं। जो गांव में रहने वाले लोगों की रक्षा करते आए हैं। ऐसा बताते हैं पूर्व में जिस भी डाकुओं ने गांव में प्रवेश किया वह बचकर नहीं जा सका।
पहलीबार गांव से चले गए लोगों से व्यक्तिगत कर रहे संपर्क
गांव से निकलकर अन्य शहरों में रहने चले गए लोगों से व्यक्तिगत संपर्क कर रणछोड़जी मंदिर के जीणोद्धार में आर्थिक सहयोग ले रहे हैं। ताकि गांव से धंधे, नौकरी सहित अन्य कामों की खोज में चले गए लोगों का अपनी मातृभूमि (ऐंनो) के प्रति लगाव, श्रद्धा एवं अपनापन बना रहे। और समय-समय पर रणछोड़जी के दर्शन कर पुण्य लाभ कमा सकें।
क्यों कहलाते हैं श्री कृष्ण रणछोड़जी
भगवान श्रीकृष्ण से मगध के राजा जरासंध को बड़ी नफरत रहती थी। एक बार जरासंध ने श्रीकृष्ण को युद्ध के लिए ललकारा। इस युद्ध में विजय की कामना से उसने अपने साथ यवन देश के राजा कालयवन को भी युद्ध में सम्मिलत कर लिया क्योंकि कालयवन अजेय था। उसने भगवान शंकर को प्रसन्न कर वरदान प्राप्त किया था। जिसके अनुसार ना तो कोई चंद्रवंशी और ना ही सूर्यवंशी उसे मार सकता है। ना ही कोई अस्त्र मार सकता है और ना ही कोई अपने बल से उसे परास्त कर सकता है।
भगवान शंकर के इस वरदान की वजह से ही कालयवन खुद को अजेय समझता था। इसलिए जरासंध के कहने पर कालयवन ने मथुरा पर आक्रमण कर दिया। सर्वज्ञाता भगवान कृष्ण को इस बात का पहले से ही पता था कि कालयवन को परास्त नहीं किया जा सकता। इसलिए उन्होंने लीला रची और युद्ध भूमि से भाग गए। जिसकी वजह से ही उनका नाम रणछोड़ पड़ा। युद्धभूमि से भागकर श्रीकृष्ण एक अंधेरी गुफा में पहुंचे। जहां पर पहले से ही इक्ष्वाकु वंश के राजा मंधाता के पुत्र और दक्षिण कोसल के राजा मुचकुंद गहरी निद्रा में सो रहे थे।
दरअसल, राजा मुचकुंद ने असुरों से युद्ध कर देवताओं को विजय दिलाई थी। लगातार कई दिनों तक युद्ध की वजह से बहुत थक गए थे। इसलिए देवराज इंद्र ने उनसे सोने का आग्रह किया और वरदान दिया कि जो कोई भी आपको निद्रा से जगाएगा वो जलकर भस्म हो जाएगा। श्रीकृष्ण ने लीला स्वरुप उसी गुफा में प्रवेश किया था। जहां मुचकुंद सोए थे। भगवान का पीछा करते हुए जब कालयवन उस गुफा में पहुंचा तो श्री कृष्ण ने उसे भ्रमित करने के लिए अपना पीतांबर राजा मुचकुंद के ऊपर डाल दिया। अंधेरी गुफा में कालयवन को लगा कि श्री कृष्ण गुफा में छिपकर सो रहे हैं। इसलिए उसने राजा मुचकुंद को श्रीकृष्ण समझकर जगा दिया। राजा मुचकुंद के जगते ही कालयवन भस्म हो गया। भगवान श्रीकृष्ण ने पूरे जीवनकाल में तमात लीलाएं की और लोगों का उद्धार किया। यह लीला भी इसी में से एक है जिसके बाद उनका नाम रणछोड़ पड़ा।

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